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 Post subject: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Sun Jan 25, 2009 6:12 pm 
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Joined: Fri Nov 07, 2008 7:21 am
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ख़ुशी की उम्र-बचपन या जवानी

निदा फ़ाजली
शायर और लेखक


बचपन में त्योहार की ख़ुशियाँ कुछ और ही होती हैं
त्यौहार बच्चों के होते हैं. उनके लिए ऐसे अवसरों का अर्थ होता है-नए कपड़े, अच्छे जूते, सैर-सपाटा और मिठाइयाँ. वे इन त्यौहारों का पहले से इंतज़ार करते हैं. रात को देर से सोकर जल्दी जाग जाते हैं और ख़ुशियों का शोर मचाते हैं.
बचपन गुज़र जाने के बाद, बड़े इन त्यौहारों को छोटों की ख़ुशी के लिए मनाते हैं. वे इनमें शामिल होते हैं सिर्फ़ बच्चों के लिए. उन्हें ख़ुश देखकर मुस्कुराते हैं, उनकी ख़ुशी के लिए धन लुटाते हैं. उन्हें खुश करने के लिए नए-नए कपड़े बनवाते हैं. उम्दा किस्म की मिठाइयाँ लाते हैं.

सच पूछा जाए तो त्यौहार मनाने की दो ही उम्रें होती हैं, एक बचपन की उम्र और दूसरी वह उम्र जब लड़के को हर लड़की राजकुमारी और लड़की को अपनी उम्र का हर लड़का बनवारी नज़र आता है.

इन दो उम्रों के बीत जाने के बाद घर वाले अपने लिए कम घरवालों के लिए ज़्यादा जीते हैं. हक़ीकत में जीने वाली उम्रें यही दो उम्रें होती हैं.

इन्हीं उम्रों में जोश, उत्साह और साहस इतना होता है कि कोई काम मुश्किल नज़र नहीं आता. जब महान योद्धा नेपोलियन ने कहा था मेरे शब्दकोश में असंभव नाम का कोई शब्द नहीं है. तब उसके शरीर में जवानी की हसरत थी और उसमें दुनिया को जीत लेने की ताक़त थी और इन दोनों से दूर पुख्ता उम्र की हक़ीकत थी.

कहते हैं आदमी तब तक जवान रहता है जब तक दिल में अरमान रहता है. मलिका पुखराज ने भी हफीज़ जालंधरी का मशहूर गीत गाया था. जिसने कई वर्षों तक बुढापे की सरहद में दाखिल होने वालों का दिल बहलाया था. ‘अभी तो मैं जवान हूँ.’ इस पंक्ति में शब्द ‘अभी’ में जो गम छुपा है उसको विषय बनाकर एक शायर ने कहा था

क्या कहिए कितनी जल्दी जवानी गुजर गई
मैं सोचता रहा, किधर आई, किधर गई
मैं सिर्फ़ इसकी इतनी हक़ीकत समझ सका
इक लहर थी, जो आई, उठी और उतर गई.

जवानी के साथ बचपन को भी सुनहरी उम्र कहते हैं. वह इसलिए कि इस उम्र में ग़म और ख़ुशी के एहसास में अंतर का आभास नहीं होता. इस उम्र में समय एक जुट होता है. वह हिंदुस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान की तरह सरहदों में विभाजित नहीं होता. भविष्य, अंत और वर्तमान में इसके टुकड़े नहीं होते. सब कुछ वर्तमान होता है. जीवन आसान होता है.

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

बचपन, जवानी और बुढापे की सोचें भी उम्र के साथ बदलती रहती हैं. दुनिया वही रहती है. लेकिन एक ही दुनिया कभी रंगीन नज़र आती है, कभी हसीन नज़र आती है और कभी गमगीन नज़र आती है.

लेकिन भारतीय कल्चर में दो अवसर ऐसे भी हैं, जिसमें उम्रों का फ़र्क ख़त्म हो जाता है. हर उम्र का आदमी इन त्यौहारों में शरीक होता है. उम्रों का अंतर इन अवसरों में समाप्त हो जाता है. सारे के सारे एक ही उम्र में जीते हैं, हँसते हैं गाते हैं और जशन मनाते हैं.

उम्रों का फर्क ख़त्म करने वाले इस त्यौहार को हमारे देश में दीपावली कहा जाता है. चिरागों का त्योहार. रोशनी का संस्कार, उजालों का सत्कार. यह रोशनी असत्य पर सत्य की विजय की प्रतीक है. राम-रावण के युद्ध में रावण की पराजय यानि सच्चाई के हाथों बुराई का अंत इस जशन का मूल कारण है.

संसार में भले ही सच पर झूठ हावी हो जाए. संसार में भले ही अफ़ग़ानिस्तान और बग़दाद में आम जीवन रोए-चिल्लाए, संसार में भले ही गुजरात इंसानी ख़ून से नहलाया जाए, संसार में भले ही दिल्ली में गुरूनानक की बानी बेबसी के आँसू बहाए, संसार में भले ही सूफी मुइनुद्दीनचिश्ती की दरगाह पर बम उड़ाया जाए, लेकिन संसार में कही भी न्याय की पराजय या अन्याय की विजय को त्यौहार की तरह नहीं मनाया जाता.

अमरीका के राष्ट्रपति बुश भी ‘ईसा मसीह की क़ुर्बानी’ को याद करते हैं. ओसामा बिन लादेन भी अपने हर वक्तव्य को उसी खुदा के नाम से शुरू करते हैं जो रहमान (रहमत करने वाला) भी है और रहीम (रहम करने वाला) भी है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी हर दीवाली में जनता के बीच आकर कई सरों वाले रावण का पुतला जलाते हैं, और असत्य पर सत्य की जीत का जशन मनाते हैं.

दीवाली और मुहर्रम दो ऐसी यादों से जुड़े हुए अवसर हैं जो छोटे-बड़े, ग़रीब-अमीर, सियासी गैर-सियासी, हिंदुत्ववादी, जेहादी सब एक साथ मिलकर सच्चाई का ध्वज लहराते हैं और संसार की अशांति में शांति की दुआओं के लिए हाथ उठाते हैं.

दीपावली और मुहर्रम दोनों के उद्देश्य ज़रूर एक से हैं, लेकिन फ़र्क केवल इतना है, मुहर्रम में हार को जीत के तौर पर मनाया जाता है और दीवाली में राम की जीत को बुराई की पराजय के तौर पर दर्शाया जाता है.

इन जशनों से एक बात तो सिद्ध होती है कि आदमी ऊपर से कुछ भी हो अंदर से वह झूठ की तुलना में सच के पक्ष में था. और हमेशा रहेगा और यही नाउम्मीदी के अंधेरों में रोशनी की किरण के समान है. रोशनी का स्वागत इंसान की फितरत है. और यही धरती पर आकाश की नेमत है.

आकाश की इस नेमत को ग़ालिब के युग में, ताजमहल के नगर के एक फक्कड़ शायर में बड़ी ख़ूबसूरती से याद किया है.

नज़ीर अकबराबादी हर आस्था को अपनी आस्था मानते थे, हर धर्म को अपने धर्म की तरह पहचानते थे, हर नेक बंदे को अपना दोस्त जानते थे...असत्य पर सत्य की जीत-दीवाली को उन्होंने अपनी कई कविताओं का विषय बनाया है.

उन्होंने अपने युग में राम को भी गाया था. रावण की हार पर भी दीप जलाया था और करबला में यज़ीद और हुसैन की जंग में हुसैन के कत्ल को ज़िंदगी की तरह अपनाया था...राम-रावण के युद्ध की तरह हुसैन और यज़ीद की लड़ाई भी इंसाफ़ और नाइंसाफ़ी की लड़ाई के समान थी.

जंग के फैसले मैदाँ में कहाँ होते है
जल तलक हाफिज़ा (स्मरण) बाकी है, अलम (जंग का निशान) बाकी है...

झूठ-सच के संघर्ष में नज़ीर की क़लम का जादू भी देखिए. नज़ीर सिर्फ़ दीवाली देखते नहीं थे इसमें शामिल भी होते थे.

हरेक मठ में जला फिर दिया दिवाली का,
हरेक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई,
पुकारते हैं कि लाला, दिवाली है आई
शगून पहले करो तुम ज़रा दिवाली का.

नज़ीर धरती से जुड़े रचनाकार थे. वह रोशनी के परस्तार थे. अपनी जवानी में किसी के हुस्न के गिरफ़्तार थे. बुढापे में हर आस्था के त्यौहार थे.

जो भी किया, किया न किया फिर किसी को क्या
दिल था हमारा, हमने दिया फिर किसी को क्या.
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainmen ... vals.shtml


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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Sun Jan 25, 2009 6:16 pm 
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Joined: Fri Nov 07, 2008 7:21 am
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मैं पल दो पल का शायर हूँ...

निदा फ़ाजली
शायर और लेखक





कैफ़ी आज़मी के नाम से ट्रेन भी चलाई जा चुकी है
वक़्त के साथ हमारी तहज़ीब के चेहरे भी बदलते हैं.
पहले आबादी कम थी, अब ज़्यादा है. बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ बाज़ार भी फैला है. फ़ैलते बाज़ार ने अपने मैयार और संस्कार में तब्दीलियाँ पैदा की हैं.

इन तब्दीलियों में विज्ञान के नए-नए आविष्कारों का भी अपना रोल काम का रहा है. टेलीफ़ोन की सुविधा ने ख़तो-किताबत की रस्म को कम कर दिया, टीवी चैनलों ने पढ़ने को कम करके देखने पर अधिक ज़ोर दिया.

यातायात के तेज़ रफ़्तार साधनों ने किसी दृश्य या नज़ारों से जुड़ने की परंपरा को समाप्त कर दिया. फ़ासलों का आकर्षण नज़दीकियों की बोरियत में ढल रहा है. इस बोरियत ने जीवन के मूल्यों पर हमारे विश्वासों को ही समाप्त नही किया, इस समापन को दर्शन का रूप भी दे दिया.

अस्तित्ववादी सोच ने जीवन में निरंतरता को क्षणिकता में बदल दिया. नस्ल-दर-नस्ल चलने वाला जीवन अब क्षणों का हिसाब-किताब बन गया है.

आज बड़े-बड़े पावन ग्रंथ, जो पहले मानव आचरण में नज़र आते थे, नेताओं की बाज़ारी राजनीति में जगमगाते हैं. इन परिवर्तनों ने हमारी तहज़ीब को जो रूप दिया है उसमें क्रिकेट का बल्ला, फ़िल्म अभिनेता का चेहरा, गायक की आवाज़ और राजनेताओं के अल्फाज़ ही ज़्यादा हावी नज़र आते हैं.

बाज़ार की माया

बाज़ार में जो चीज़ अधिक बिकती है वही हर जगह दिखती है.

पहले ग़ालिब की ग़ज़ल अपने पैरों से चलती थी. निरालाजी की कविता को देश में घूमने-फिरने में किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. कबीर छोटी संगतों से निकलकर आप ही आप बड़ी सोहबतों में पहुँच जाते थे. लेकिन आज मामला दूसरा है. ग़ालिब की गज़ल को जगजीत सिंह की गायकी या नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की ज़रूरत पड़ती है और हरिवंश राय बच्चन को याद कराने के लिए अमिताभ बच्चन को सामने आना पड़ता है. क़ैफ़ी आज़मी को मनवाने के लिए शबना आज़मी को अपनी फ़िल्मी शोहरत को काम में लाना पड़ता है.


लता मंगेशकर ने एक बयान दिया था. मेरा हमेशा से सपना रहा है कि मैं अटल जी की रचनाएँ गाऊँ. परंतु सपने के हकीक़त बनने की मुद्दत में सरकार बदल गई और फिर लताजी भी अपने सपने को भूल गईं. अटल जी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी कवि हैं. लेकिन उनके शासनकाल की अवधि थोड़ी कम थी वरना उनकी रचनाओं को गाने के सपने भी कई गायकों की आवाज़ों में साकार हो जाते



बच्चन जी के साथ ही नागार्जुन और शिवमंगल सिंह सुमन परलोक सिधारे थे लेकिन सहारा परिवार को अमिताभ के कारण सिर्फ़ बच्चन जी ही याद आए. क़ैफी आजमी के आगे-पीछे उनके कई और महत्वपूर्ण समकालीन ज़िंदगी की लड़ाई हारे थे लेकिन रेल मंत्रालय ने शबाना के कारण क़ैफ़ी की याद में ‘कैफ़ियत’ नाम से ट्रेन चलाई.

सिनेमा के साथ राजनीति का प्रभाव भी साहित्य पर कुछ कम नहीं है. मेरे घर की एक दीवार पर साउथ एशियन साहित्यिक रिकार्डिंग का एक सचित्र बोर्ड लटका है. इसमें भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश की विभिन्न भाषाओं के जाने-माने साहित्यकारों की तस्वीरें हैं. इन सारे साहित्यकारों की आवाज़ में उनकी रचनाओं की रिकार्डिंग अमरीका की एक सांस्कृतिक संस्था ने की थी.

इन साहित्यकारों में सबसे ऊपर की क़तार में अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान हैं. यह प्रोजेक्ट उस समय का था जब अटल जी प्रधानमंत्री थे और उनकी परंपरागत कविताएँ, मंचीय होने के बावजूद पाकिस्तान में अनूदित भी हो रही थी और हिंदुस्तान में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह इन कविताओं की पूरी सोलो सीडी बना रहे थे. उन्हीं दिनों लता मंगेशकर ने एक बयान दिया था. मेरा हमेशा से सपना रहा है कि मैं अटल जी की रचनाएँ गाऊँ. परंतु सपने के हकीक़त बनने की मुद्दत में सरकार बदल गई और फिर लताजी भी अपने सपने को भूल गईं. अटल जी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी कवि हैं. लेकिन उनके शासनकाल की अवधि थोड़ी कम थी वरना उनकी रचनाओं को गाने के सपने भी कई गायकों की आवाज़ों में साकार हो जाते.

कैफ़ी और जाफ़री

ई-टीवी के उर्दू चैनल पर शबाना ने अपने पिता कैफ़ी आज़मी की याद में एक प्रोग्राम किया था, इसमें कई गायकों ने उनकी ग़ज़ले गाईं. कई अभिनेताओं ने उनके संबंध में अपने विचार व्यक्त किए. उस आयोजन में किसी साहित्यकार को आमंत्रित नहीं किया गया था. इस आयोजन से पहले जुहू के इलाक़े में एक पार्क उनके नाम हो चुका था. इससे पहले उत्तरप्रदेश में एक ट्रेन उनके नाम की जा चुकी थी.

ज्ञानपीठ विजेता सरदार जाफ़री की विधवा सुल्ताना जाफ़री भी इस आयोजन में थीं. वह साहित्य और फ़िल्म के इस गठजोड़ पर अचानक भड़क उठीं और कहा, "भई कैफ़ी अच्छे शायर थे, मगर यह अच्छाई इतनी भी नहीं है कि वह सरदार जैसे बड़े लेखक को छुपा दे." वे वही सुल्ताना जाफ़री थीं जो सरदार जाफरी की एक मशहूर नज़्म में नज़र आती हैं.

नज़्म का उन्वाव 'मेरा सफ़र है' और उस नज़्म का एक हिस्सा यूँ है,

लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहाँ
हर माशूक़ा सुल्ताना है

सुल्ताना जाफ़री, सरदार जाफ़री की माशूका बनने से पहले, किसी दूसरे घर की ज़ीनत थीं, लेकिन उनके दिल में अपने ज़माने के मशहूर तरक्की पसंद शायर और तकरीर करने वाले नौजवान सरदार की मुहब्बत थी और इस मुहब्बत ने एक बेटी की माँ को शादी-शुदा शरीअत को अपनी बग़ावत बनाने पर मजबूर कर दिया.

सरदार से उनके दो बेटे हुए, नाज़िम और हिकमत. इन बेटों के नाम सरदार के पसंदीदा शायरों में से एक शायर के एक नाम को दो हिस्सों में बाँट कर रखे गए थे. सरदार हिंदुस्तान के ग़ालिब और कबीर के साथ तुर्की के नाज़िम हिकमत के भी आशिक थे.

सरदार ने बहुत लिखा. उन्होंने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा. वह आलोचक भी थे. अच्छे फ़िल्मसाज़ भी थे. प्रभावशाली वक़्ता भी थे और उनके साथ 99 शायरी के संकलनों के शायर भी थे. इनमें ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) हैं.

सरदार अब हमारी दुनिया में नहीं है. लेकिन उन्होंने अपनी नज़्म 'मेरा सफ़र' में फ़ारसी के शायर रूमी के एक मिसरे के ज़रीए जीवन की मौत पर विजय की बात कही है.


सरदार जाफ़री ने नए शब्दों और विचारों के साथ रचनाएँ कीं

उन्होंने भी पेशनगोई की थी...लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा...अगर यह सही है तो मैं उन्हें फिर इस संसार में आने से पहले एक मशवरा ज़रूर देना चाहूँगा. वह इस संसार में इस बार आएँ तो अपने बेटों को तुर्की के शायर नाम देने के बजाए फ़िल्म एक्टरों या क्रिकेटरों के नामों में से नाम चुनें, नहीं तो बाज़ार की तराज़ू में उनका सही वज़न नहीं नापा जाएगा.

यह हक़ीक़त है कि सन् 1935-36 में शायरों की जो नस्ल टैगौर, फिराक़, प्रेमचंद्र या और जोश की वारिस बन कर आई थी, उसमें अपनी शैली शब्दावली और विचारों के लिहाज़ से दो नाम ही रौशन नज़र आते हैं. इनमें एक फ़ैज़ थे दूसरे सरदार जाफ़री थे.

जाफ़री की शायरी की भाषा का बड़ा हिस्सा ईरान के उस असर से आज़ाद है, जिससे उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा बोझिल है, उनके यहाँ ऐसी पंक्तियाँ जैसे, 'गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी', 'धुएँ से काले तवे भी चिंगारियों के होठो से हँस रहे हैं' या 'इमलियों के पत्तों पर धूप पर सुखाती है' आदि शायरी में नए लहजे की पहचान कराते हैं.

सरदार के तो दो बेटे थे. साहिर ने तो कालेज के दिनों में हुए इश्क के ग़म में शादी ही नहीं की. उनकी आख़िरी किताब ‘आओ कि ख़्वाब बुनें’ में एक नज़्म अमृता प्रीतम के नाम भी है. साहिर की विरासत में सिवाए ‘परछाइयाँ’ नाम की एक इमारत के कोई नहीं है. यह इमारत भी अब हुकूमत के सुपुर्द है. अगर उनके वारिसों में कोई एक्टर या एक्ट्रेस होते तो उनकी क़ब्र बम्बई के क़ब्रिस्तान में निशान से बेनिशान नहीं होती.

मैं पल दो पल का शायर हूँ. पल दो पल मेरा फ़साना है.


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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Mon Jan 26, 2009 12:41 am 
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Joined: Sun Oct 26, 2008 4:23 am
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Very nice !! :clap:

Thanks much for posting in devanagri !

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं, तो कहीं आसमां नहीं मिलता
- निदा फ़ाजली


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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Tue Jan 27, 2009 9:11 am 
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Joined: Fri Nov 07, 2008 7:21 am
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senty wrote:
Very nice !! :clap:

Thanks much for posting in devanagri !

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं, तो कहीं आसमां नहीं मिलता
- निदा फ़ाजली
yw..
Thanks Senti for a nice sher of Nida Fazali ..There is so much truth and reality in this sher..


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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Tue Jan 27, 2009 9:15 am 
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Joined: Fri Nov 07, 2008 7:21 am
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ग़ालिब और इज़ारबंद की गाँठें


निदा फ़ाज़ली
शायर और लेखक


इतिहास सिर्फ़ राजाओं और बादशाहों की हार-जीत का नहीं होता. इतिहास उन छोटी-बड़ी वस्तुओं से भी बनता है जो अपने समय से जुड़ी होती हैं और समय गुज़र जाने के बाद ख़ुद इतिहास बन जाती हैं.
ये बज़ाहिर मामूली चीज़ें बहुत ग़ैरमामूली होती हैं.

इसका एहसास मुझे उस वक़्त हुआ जब भारत के पूर्व राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने मिर्ज़ा ग़ालिब की याद में एक ‘ग़ालिब म्यूज़ियम’ बनवाया.

दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज के सामने बनी यह ख़ूबसूरत इमारत है, जिसे ‘ऐवाने-ग़ालिब’ या ग़ालिब इंस्टीट्यूट कहा जाता है, ऐसी ही मामूली चीज़ों से ग़ालिब के दौर को दोहराती है.

यह इमारत मुग़ल इमारत-साज़ी का एक नमूना है.

आख़िरी मुग़ल सम्राट के समय के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के समय को, उस समय के लिबासों, बर्तनों, टोपियों, पानदानों, जूतों और छोटे-बड़े ज़ेवरों से दिखाकर एक ऐसा इतिहास रचने को कोशिश की गई है.

यह इतिहास उस इतिहास से मुख़्तलिफ़ है जो हमें स्कूल या कॉलेजों में पढ़ाया जाता है जिसमें तलवारों, बंदूकों और तोपों को हिंदू-मुस्लिम नाम देकर आदमी को आदमी से लड़ाया जाता है और फिर अपना अपना वोट बैंक बनाया जाता है.

ग़ालिब का इज़ारबंद

इस 'ग़ालिब म्यूज़ियम' में और बहुत सी चीज़ों के साथ किसी हस्तकार के हाथ का बना हुआ एक इज़ारबंद भी है.

समय गतिशील है, यह एक यथार्थ है.लेकिन म्यूज़ियम में रखी पुरानी चीज़ों में समय का ठहराव भी कोई कम बड़ा यथार्थ नहीं है.

आँख पड़ते ही इनमें से हर चीज़ देखने वाले को अपने युग में ले जाती है और फिर देर तक नए-नए मंज़र दिखाती है.


ग़ालिब दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में रहा करते थे

ग़ालिब के उस लंबे, रेशमी इज़ारबंद ने मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही व्यवहार किया.

ग़ालिब म्यूज़ियम में पड़ा हुआ मैं अचानक 2006 से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे.

इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में 1857 का खूनी रंग भर रहे थे.

ग़ालिब का शेर है -

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ अपना

हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है.

ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”
ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”
अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”
ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”
अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”
ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”
अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”
ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”
अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”
ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”
अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”
ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”

ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया.

गाठें

मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं.

ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे.

सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हरेक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता

इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ पाजामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी.


औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे



हिंदुस्तानी में इसे कमरबंद कहते हैं.

यह इज़ारबंद मशीन के बजाय हाथों से बनाए जाते थे.

औरतों के इज़ारबंद मर्दों से अलग होते थे.

औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे.

ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे.

पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे.

पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था.

मुहावरों में इज़ारबंद

इस एक शब्द से ‘क्लासिक पीरियड’ में कई मुहाविरे भी तराशे गए थे जो उस जमाने में इस्तेमाल होते थे.


ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे



इनमें कुछ यूँ हैं, ‘इज़ारबंद की ढीली’ उस स्त्री के लिए इस्तेमाल होता है जो चालचलन में अच्छी न हो. मैंने इस मुहावरे को छंदबद्ध किया है

जफ़ा है ख़ून में शामिल तो वो करेगी जफ़ा
इज़ारबंद की ढीली से क्या उमीदे वफ़ा

‘इज़ारबंद की सच्ची’ से मुराद वह औरत है जो नेक हो ‘वफ़ादार हो’. इस मुहावरे का शेर इस तरह है,

अपनी तो यह दुआ है यूँ दिल की कली खिले
जो हो इज़ारबंद की सच्ची, वही मिले

इज़ारबंदी रिश्ते के मानी होते हैं, ससुराली रिश्ता. पत्नी के मायके की तरफ़ का रिश्ता.

घरों में दूरियाँ पैदा जनाब मत कीजे
इज़ारबंदी ये रिश्ता ख़राब मत कीजे

इज़ार से बाहर होने का अर्थ होता है ग़ुस्से में होश खोना.

पुरानी दोस्ती ऐसे न खोइए साहब
इज़ारबंद से बाहर न होइए साहब

इज़ारबंद में गिरह लगाने का मतलब होता है किसी बात को याद करने का अमल.

निकल के ग़ैब से अश्आर जब भी आते थे
इज़ारबंद में ‘ग़ालिब’ गिरह लगाते थे

ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे.

कबीर और नज़ीर को पंडितों तथा मौलवियों ने कभी साहित्यकार नहीं माना. कबीर अज्ञानी थे और नज़ीर नादान थे. इसलिए कि वो परंपरागत नहीं थे. अनुभव की आँच में तपाकर शब्दों को कविता बनाते थे.

नज़ीर मेले ठेलों में घूमते थे. जीवन के हर रूप को देखकर झूमते थे. इज़ारबंद पर उनकी कविता उनकी भाषा का प्रमाण है.

उनकी नज़्म के कुछ शेर -

छोटा बड़ा, न कम न मझौला इज़ारबंद
है उस परी का सबसे अमोला इज़ारबंद

गोटा किनारी बादल-ओ- मुक़्क़ैश के सिवा
थे चार तोला मोती जो तोला इज़ारबंद

धोखे में हाथ लग गया मेरा नज़ीर तो
लेडी ये बोली जा, मेरा धो ला इज़ारबंद

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here is the title song of serial called jaane kya baat hui written by nida fazli



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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
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Beautiful thread. :)

Nida Fazli - Dushmani laakh sahi khaTm na keeje rishta



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 Post subject: Re: Andaze biyan..Nida Fazali
New postPosted: Tue Mar 17, 2009 4:40 am 
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He wrote some philosophical dohe as well

छोटा करके देखिये, जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकाश है, बाँहों भर संसार ।

ले के तन के नाप को, घुमे बस्ती गाँव,
हर चादर के घेर से, बाहर निकले पाँव ।

अच्छी संगत बैठकर, संगी बदले रूप,
जैसे मिलकर आम से, मिठी हो गयी धूप ।

सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास,
पाना खोना खोजना, सांसो का इतिहास ।


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